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मुस्कुराइए, आप प्रधानमंत्री के साथ हैं और आपकी ट्रेन समय पर नहीं है

देश में रेल में यात्रा

हमारे देश में करों और अन्य शुल्कों के माध्यम से हमसे एकत्र किए गए धन को केंद्र सरकार को सौंप दिया जाता है. लेकिन उन पैसों को आखिर कहां और कैसे खर्च किया जाता है. मध्य रेलवे भारतीय रेलवे के 19 जोनों में से एक है. जिसका मुख्यालय मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस में है. हाल ही में रेलवे ने खुद जवाब RTI को जवाब दिया है.

चलिए समझते हैं इस पूरी  प्रक्रिया के बारे में, अकेले मध्य रेलवे क्षेत्र के प्लेटफार्मों पर, 6.25 लाख रुपये की लागत से लगभग 20 “स्थायी” सेल्फी बूथ स्थापित किए गए हैं. जिनकी कुल लागत 1.25 करोड़ रुपये है, और 32 अन्य “अस्थायी” सेल्फी बूथ हैं. जिसमें प्रत्येक की कीमत 1.25 लाख रुपये यानि 40 लाख रुपये है.
इसमें अनिवार्य रूप से प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का एक जीवन-आकार 3 डी मॉडल है. पीएम मोदी के पास कम बजट के दो-आयामी जीवन-आकार के कटआउट भी हैं. लोगों के लिए मोदी के साथ खड़े होने और अपने फोन कैमरों के साथ सेल्फी लेने के लिए प्रॉप्स यानि मूल प्रस्ताव हैं.
इसे सोशल मीडिया में इसलिए वायरल किया जा रहा है जिससे हमारे प्रधानमंत्री की लोकप्रियता को बढ़ाया जा सके. इन प्रॉप्स में ऐसे टेक्स्ट और चित्र भी हैं जो राष्ट्रीय या राज्य एजेंसियों की कुछ प्रमुख योजनाओं, कार्यक्रमों या उपलब्धियों को उजागर करते हैं, जिनके लिए सरकार खुद का क्रेडिट चाहती है.
इस तरह साधा कहा जा सकता है कि रेलवे स्टेशनों पर सेल्फी पॉइंट अब स्पष्ट रूप से एक राष्ट्रीय प्राथमिकता है.
दुख की बात तो ये है कि रेल दुर्घटनाएं में हुए जानमाल की हानि में कोई सुधार नहीं किया जा रहा है. लेकिन सेल्फी पॉइंट को खास माना जा रहा है.
2 जून, 2023 शायद ही किसी को भूला होगा. जब कई मासूम और बेजुवानों ने अंतिम बार यात्रा की होगी. ऐसे कई रेल हादसे हैं जिनको भी हम आपको बताएंगे.

2 जून, 2023 के दिन ही ओडिशा के बालासोर जिले में बहनागा रेलवे स्टेशन के पास तीन अलग-अलग पटरियों पर चल रही कोरोमंडल एक्सप्रेस, बेंगलुरु-हावड़ा सुपरफास्ट एक्सप्रेस और एक मालगाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी. आज तक मरने वालों की संख्या की पुष्टि नहीं की गई. लेकिन 300 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए ये बताया गया है.

13 जनवरी, 2022 को पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार में बीकानेर-गुवाहाटी एक्सप्रेस के 12 डिब्बे पटरी से उतर गए, जिसमें नौ लोगों की मौत हो गई और 36 घायल बताए गए.

फिर 23 अगस्त, 2017 को दिल्ली जाने वाली कैफियत एक्सप्रेस के नौ डिब्बे उत्तर प्रदेश के औरैया के पास पटरी से उतर गए, जिसमें कम से कम 70 लोग घायल हो गए.
18 अगस्त, 2017 को मुजफ्फरनगर में पुरी-हरिद्वार उत्कल एक्सप्रेस पटरी से नीचे उतर गई, जिसमें 23 लोगों की मौत हुई और लगभग 60 घायल हो गए थे.

इसी तरह 20 नवंबर 2016 को इंदौर-पटना एक्सप्रेस 19321 कानपुर के पुखरायां के पास ट्रेन पटरी से उतर गई, जिसमें 150 लोगों की मौत हो गई और इससे अधिक लोग घायल हो गए थे.

26 मई 2014 को उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर क्षेत्र के गोरखधाम एक्सप्रेस खलीलाबाद स्टेशन के पास रुकी हुई मालगाड़ी से टकरा गई, जिसके परिणामस्वरूप 25 लोगों की मौत हुई और 50 से अधिक घायल हो गए थे.
धन्य है रेल प्रशासन इतनी दुर्घटनाओं होने के बाद भी इन्हे कोई फर्क नहीं पड़ता.
हर दिन रेलवे स्टेशन में लाखों लोग आते हैं. ऐसे में पीएम मोदी के व्यक्तित्व और उनकी “उपलब्धियों” को उजागर करने से उन्हे निश्चित ही राजनीतिक लाभ मिलेगा. जैसे हवाई जहाज में यात्रियों को सरकारी प्रचार सुनने पर मजबूर होना पड़ता है. लेकिन विमान मंत्रालय के पूर्ण अंक में रेलवे क्यों पीछे हैं ?
इसमें मंत्री की प्राथमिकताएं बिल्कुल साफ कर दी गई है. रेल सुरक्षा में सुधार, या यात्रियों के लिए पर्याप्त स्लीपर बर्थ और सीटें उपलब्ध कराने के लिए बजट का उपयोग अधिक राष्ट्रवादी उद्देश्यों के लिए किया जाता है. ठीक उसी में एक और खर्च शमिल हो गया है पीएम मोदी के साथ तस्वीरें लेने के लिए सेल्फी बूथ का बनाना.
2023 के संसद के बजट सत्र में सेल्फी बूथ में खर्च की बात हो गई है.
अब आपको इन तमाम उदाहरणों से ये बात तो बिल्कुल साफ हो गई होगी कि भारतीय रेलवे की स्थिति, विशेष रूप से इसके गिरते सुरक्षा मानक, एक आतंक है, हालांकि यह हमारे देश की जीवन रेखा है. पर किसे परवाह है? भले ही बुजुर्गों को ट्रेन टिकट में मदत न मिले लेकिन मंत्री के बॉस तो तभी खुश होंगे जब वह पर्याप्त सेल्फी प्वाइंट लगवाएंगे.

इस पूरे बकवास पर पैसा कौन खर्च कर रहा है? ये तो आप जान ही गए होंगे.
हमारे देश में रेल में यात्रा करके कौन अपनी जान जोखिम में डालता है? वो भी आप ही हैं.

जब रेलवे अमीरों के लिए शानदार एसी आवास की सुविधा के लिए गैर-एसी स्लीपर बर्थ की संख्या कम कर देता है, तो ट्रेन से यात्रा करने के लिए किसे गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है? वो भी आप हैं, फिर से ठीक है.
ये कहना कोई गलत नहीं होगा कि हमारे देश की सरकार निस्संदेह “सूट-बूट की सरकार” है. यहां केवल अमीरों की सेवा होती है, और सरकारी धन का उपयोग केवल झूंठी तारीफ को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है.
(पॉल कोशी बुनियादी ढांचे के विकास और इंजीनियरिंग क्षेत्र में सलाहकार हैं।)