Table of Contents
Toggleलोकसभा: लोकसभा का ठंडा मानसून, 22 साल में सबसे कम कामकाज
भारत की संसद लोकतंत्र का वह मंच है, जहां देश की सबसे बड़ी समस्याओं पर बहस होनी चाहिए, सरकार से सवाल पूछे जाने चाहिए और कानूनों को विस्तार से समझकर बनाया जाना चाहिए. लेकिन 2026 का मानसून सत्र इन उम्मीदों पर सवाल खड़े करता हुआ खत्म हुआ.
13 अगस्त को संसद का मानसून सत्र समाप्त हुआ. इसके साथ ही एक ऐसा आंकड़ा सामने आया, जिसने संसदीय कामकाज को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है. लोकसभा ने इस सत्र में पिछले करीब 22 वर्षों के सबसे कम उत्पादक सत्रों में जगह बनाई. PRS Legislative Research के आंकड़ों के अनुसार, लोकसभा अपनी निर्धारित अवधि के मुकाबले केवल 15 प्रतिशत समय ही काम कर सकी. वहीं संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा की उत्पादकता 19 प्रतिशत और राज्यसभा की 39 प्रतिशत बताई. आंकड़ों में यह अंतर गणना की पद्धति से जुड़ा है.
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि संसद में कितने विधेयक पास हुए. असली सवाल यह है कि सांसदों को जनता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने, सरकार से जवाब मांगने और कानूनों की समीक्षा करने के लिए कितना समय मिला?
यह भी पढ़ें: झारखंड: JPSC-JSSC परीक्षा में छेड़छाड़ का आरोप, 300 अभ्यर्थियों को पास कराने का दावा
19 दिन का सत्र, लेकिन कामकाज बेहद सीमित
2026 का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हुआ था और 13 अगस्त को समाप्त हुआ. शुरुआत से ही सदन में हंगामे और विरोध का असर दिखाई दिया. विपक्ष की ओर से NEET-UG से जुड़े कथित पेपर लीक, छात्रों के प्रदर्शन और अन्य मुद्दों पर चर्चा की मांग की गई. कई मौकों पर सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी.
सत्र के शुरुआती दिनों में ही लोकसभा और राज्यसभा की उत्पादकता बेहद कम दर्ज की गई. पहले सप्ताह में लोकसभा केवल करीब 5 प्रतिशत और राज्यसभा करीब 6 प्रतिशत समय ही काम कर सकी थी.
यह स्थिति धीरे-धीरे पूरे सत्र की पहचान बनती गई. सत्ता पक्ष विपक्ष पर सदन न चलने देने का आरोप लगाता रहा, जबकि विपक्ष का कहना रहा कि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर पर्याप्त चर्चा से बच रही है.
नतीजा यह हुआ कि संसद के भीतर बहस और संवाद के लिए निर्धारित समय का बड़ा हिस्सा नारेबाजी, विरोध और स्थगन में चला गया.
आखिर संसद का कामकाज इतना कम क्यों हुआ?
संसद में व्यवधान कोई नई बात नहीं है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष को सरकार की नीतियों का विरोध करने और जनता से जुड़े मुद्दे उठाने का अधिकार है. कई बार विरोध के कारण सदन की कार्यवाही बाधित भी होती है.
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब विरोध और बहस के बीच संतुलन खत्म हो जाए.
2026 के मानसून सत्र में NEET-UG और छात्रों के आंदोलन जैसे मुद्दे विपक्ष के प्रमुख एजेंडे में रहे. विपक्ष ने इन मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगा. सरकार की ओर से भी चर्चा की पेशकश किए जाने की बात कही गई, लेकिन दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन सकी.
इसके बाद संसद में गतिरोध लगातार बढ़ता गया.
लोकसभा अध्यक्ष की ओर से भी सदन में व्यवधान को लेकर चिंता जताई गई. दूसरी तरफ संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष पर चर्चा से बचने और सदन की कार्यवाही बाधित करने का आरोप लगाया. विपक्ष ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया और सरकार पर महत्वपूर्ण मुद्दों पर जवाबदेही से बचने का आरोप लगाया.
यही भारतीय संसद की मौजूदा चुनौती है—सरकार और विपक्ष दोनों के पास अपनी-अपनी दलीलें हैं, लेकिन जनता के हिस्से में बचता है सिर्फ कम हुआ संसदीय समय.
22 साल का रिकॉर्ड क्या बताता है?
PRS के आंकड़ों को देखें तो 2004 के बाद लोकसभा के कामकाज में काफी उतार-चढ़ाव रहा है.
कुछ सत्रों में संसद ने निर्धारित समय से भी ज्यादा काम किया. उदाहरण के लिए UPA सरकार के दौरान 2004 के शीतकालीन सत्र, 2005 के मानसून सत्र और 2009 के बजट सत्र में लोकसभा की उत्पादकता 100 प्रतिशत से ऊपर रही थी.
वहीं कई सत्र ऐसे भी रहे, जब राजनीतिक टकराव के कारण कामकाज लगभग ठप हो गया.
2010 के शीतकालीन सत्र में लोकसभा केवल 5 प्रतिशत समय ही काम कर सकी थी. 2013 के शीतकालीन सत्र में यह आंकड़ा 8 प्रतिशत रहा। 2014 के बजट सत्र में लोकसभा की उत्पादकता करीब 21 प्रतिशत रही थी.
2026 का मानसून सत्र इसी कमजोर प्रदर्शन वाली सूची में शामिल हो गया है.
PRS के मुताबिक इस सत्र की लोकसभा उत्पादकता 15 प्रतिशत रही, जबकि संसदीय कार्य मंत्री ने इसे 19 प्रतिशत बताया. दोनों आंकड़े अलग होने के बावजूद एक बात साफ है—यह सत्र सामान्य संसदीय कामकाज की तुलना में बेहद कमजोर रहा.
कभी 148 प्रतिशत तक पहुंचा था कामकाज
संसद के कामकाज की तस्वीर हमेशा इतनी निराशाजनक नहीं रही है.
आंकड़े बताते हैं कि लोकसभा कई बार अपनी निर्धारित अवधि से भी ज्यादा समय तक चली है. 2024 के बजट सत्र में लोकसभा की उत्पादकता 148 प्रतिशत तक पहुंची थी. 2020 के मानसून सत्र में यह 145 प्रतिशत और 2023 के विशेष सत्र में 137 प्रतिशत रही थी.
इसका अर्थ यह है कि जब राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनती है और सदन का समय व्यवस्थित तरीके से इस्तेमाल होता है, तो संसद निर्धारित समय से भी अधिक काम कर सकती है.
इसलिए समस्या संसद की क्षमता में नहीं, बल्कि उसके संचालन और राजनीतिक माहौल में दिखाई देती है.
12 विधेयक पास, लेकिन बहस कितनी हुई?
सरकार के लिए इस सत्र की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि संसद ने कुल 12 विधेयक पारित किए. संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इसे विधायी कामकाज के लिहाज से सफल सत्र बताया. लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि बहस और चर्चा के स्तर पर सत्र संतोषजनक नहीं रहा.
यहीं से संसद की उत्पादकता का दूसरा पहलू सामने आता है.
क्या सिर्फ विधेयक पास कर देना ही संसद के कामकाज की सफलता है?
या फिर किसी कानून की हर धारा पर चर्चा, विपक्ष के सवाल, विशेषज्ञों की राय और सांसदों की आपत्तियों को सुनना भी उतना ही जरूरी है?
लोकतंत्र में कानून सिर्फ बहुमत से पारित होने वाला दस्तावेज नहीं होता. उसके पीछे लंबी चर्चा और व्यापक विचार-विमर्श भी होना चाहिए.
संसदीय कार्य मंत्री के अनुसार, लोकसभा में 12 में से 11 विधेयक बिना चर्चा के पारित हुए, जबकि एक विधेयक पर पूर्ण चर्चा हुई. इनमें सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों को रोकने से जुड़ा विधेयक भी शामिल था, जिस पर दोनों सदनों में चर्चा हुई.
यह आंकड़ा संसद के कामकाज को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर खड़ा करता है.
विपक्ष का विरोध भी लोकतंत्र का हिस्सा है
संसद में विपक्ष की भूमिका सिर्फ सरकार की आलोचना करना नहीं है. विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना, नीतियों की कमियां बताना और जनता के मुद्दों को सदन तक पहुंचाना भी है.
इसलिए हर विरोध को संसद की बर्बादी कहना सही नहीं होगा.
अगर किसी मुद्दे पर सरकार जवाब नहीं दे रही है, तो विपक्ष का दबाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है. लेकिन दूसरी तरफ अगर लगातार विरोध के कारण प्रश्नकाल, विधायी चर्चा और महत्वपूर्ण बहस का समय ही खत्म हो जाए, तो नुकसान सिर्फ सरकार या विपक्ष का नहीं बल्कि पूरे देश का होता है.
इसी संतुलन की जरूरत 2026 के मानसून सत्र में सबसे ज्यादा महसूस हुई.
सरकार की भी जिम्मेदारी, विपक्ष की भी
संसद को सुचारु रूप से चलाने की जिम्मेदारी केवल विपक्ष की नहीं है.
सरकार के पास बहुमत है, इसलिए उसके पास विधेयकों को आगे बढ़ाने और सदन की कार्यवाही चलाने की बड़ी जिम्मेदारी भी है. विपक्ष के सवालों का जवाब देना, पर्याप्त चर्चा के लिए समय देना और महत्वपूर्ण मुद्दों पर संवाद कायम करना सरकार की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है.
वहीं विपक्ष के सामने भी एक चुनौती है. विरोध दर्ज कराने के लिए सदन को लगातार बाधित करना लंबे समय में उसी विपक्ष की भूमिका को कमजोर कर सकता है.
एक मजबूत विपक्ष वह है जो सरकार को घेरता भी है और कानूनों पर वैकल्पिक दृष्टिकोण भी प्रस्तुत करता है.
जनता के लिए इसका मतलब क्या है?
संसद में कम कामकाज का असर सिर्फ सांसदों तक सीमित नहीं रहता.
जब सदन में कम समय मिलता है, तो कई सवालों पर चर्चा नहीं हो पाती. कई विधेयकों की विस्तृत जांच प्रभावित हो सकती है. समितियों के सामने जाने वाले मुद्दों पर भी असर पड़ सकता है.
सबसे बड़ी बात यह है कि जनता ने अपने प्रतिनिधियों को संसद में भेजा है ताकि वे उनके सवाल उठाएं.
बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समस्याएं, युवाओं की परीक्षाएं, कानून-व्यवस्था और विकास जैसे मुद्दे किसी एक पार्टी के नहीं होते। ये सीधे जनता के मुद्दे हैं.
अगर संसद का बड़ा हिस्सा राजनीतिक टकराव में निकल जाता है, तो इन मुद्दों पर चर्चा का समय कम हो जाता है.
संसद सिर्फ हंगामे की तस्वीर नहीं होनी चाहिए
आज संसद की तस्वीर अक्सर टीवी स्क्रीन पर नारे लगाते सांसदों, पोस्टर और स्थगित होती कार्यवाही के रूप में दिखाई देती है.
लेकिन संसद का असली काम इससे कहीं बड़ा है.
संसद वह जगह है जहां सरकार से पूछा जाता है कि देश का पैसा कहां खर्च हो रहा है. जहां यह सवाल उठता है कि कोई कानून आम नागरिक की जिंदगी को कैसे बदलेगा. जहां मंत्री अपने मंत्रालय के काम का जवाब देते हैं. जहां सांसद अपने क्षेत्र की समस्याओं को राष्ट्रीय मंच पर रखते हैं.
अगर यह प्रक्रिया कमजोर होती है तो लोकतंत्र की संस्थागत गुणवत्ता भी प्रभावित होती है.
इसीलिए 2026 के मानसून सत्र को केवल ‘हंगामे वाला सत्र’ कहकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं होगा. इससे सीखने की जरूरत है कि आने वाले सत्रों में संसद का समय कैसे बचाया जाए.
क्या संसद के कामकाज में सुधार संभव है?
बिल्कुल.
इसके लिए सबसे पहले सरकार और विपक्ष दोनों को यह स्वीकार करना होगा कि संसद किसी एक राजनीतिक दल की नहीं है.
सत्ता पक्ष को विपक्ष की आवाज सुननी होगी और विपक्ष को भी यह तय करना होगा कि विरोध का ऐसा तरीका अपनाया जाए जिससे सदन का काम पूरी तरह ठप न हो.
संसदीय समितियों को ज्यादा प्रभावी बनाया जा सकता है. विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा के लिए समय तय किया जा सकता है. महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच पहले से संवाद की व्यवस्था मजबूत की जा सकती है.
सबसे जरूरी है—संसद में असहमति हो, लेकिन संवाद बंद न हो.
लोकतंत्र में बहुमत जरूरी है, लेकिन केवल बहुमत पर्याप्त नहीं है. लोकतंत्र की असली ताकत बहस, सवाल, जवाब और असहमति को जगह देने में है.
निष्कर्ष: संसद चलेगी, तभी लोकतंत्र मजबूत होगा
2026 का मानसून सत्र भारतीय संसदीय लोकतंत्र के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़कर गया है.
जब देश की जनता अपने प्रतिनिधियों को संसद भेजती है, तो वह उनसे सिर्फ उपस्थिति की उम्मीद नहीं करती. वह चाहती है कि उसके मुद्दों पर चर्चा हो, सरकार से सवाल पूछे जाएं और ऐसे कानून बनें जिनका असर करोड़ों लोगों की जिंदगी पर पड़ता है.
PRS के आंकड़ों के मुताबिक लोकसभा की उत्पादकता 15 प्रतिशत रही, जबकि सरकार की ओर से 19 प्रतिशत का आंकड़ा दिया गया. दोनों आंकड़ों के बीच अंतर हो सकता है, लेकिन तस्वीर एक ही है—संसद ने अपने उपलब्ध समय का बहुत छोटा हिस्सा ही प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया.
विडंबना यह है कि सत्र की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संसद के सुचारु और सार्थक संचालन की उम्मीद जताई थी और कहा था कि सार्थक चर्चा तथा सामूहिक संकल्प देश को आगे ले जाने के लिए जरूरी हैं.
अब सवाल यह है कि अगले सत्र में क्या बदलेगा?
क्या सरकार और विपक्ष अपने मतभेदों के बावजूद चर्चा के लिए रास्ता निकाल पाएंगे?
क्योंकि संसद का चलना केवल सांसदों की जिम्मेदारी नहीं है. यह उस करोड़ों जनता के प्रति जवाबदेही है, जिसने लोकतंत्र पर भरोसा करके अपने प्रतिनिधियों को संसद भेजा है.
यह भी पढ़ें: मध्य प्रदेश: बिजली 10% महंगी होने की तैयारी, उपभोक्ताओं पर बढ़ेगा बोझ?