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Toggleमध्य प्रदेश: किडनी अलॉटमेंट की जांच अब NOTTO करेगा
मध्य प्रदेश में अंगदान से प्राप्त किडनी के आवंटन को लेकर उठे सवालों ने अब स्वास्थ्य व्यवस्था और ऑर्गन ट्रांसप्लांट सिस्टम की पारदर्शिता पर बहस तेज कर दी है. आरोप है कि कैडेवर डोनेशन से मिली किडनी के लिए तैयार की गई वेटिंग लिस्ट में पीछे रहने वाले मरीजों को किडनी दिए जाने के मामले सामने आए हैं.
मामले को लेकर प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, अब इस पूरे प्रकरण की जांच राष्ट्रीय स्तर की संस्था NOTTO करेगी। जांच में यह देखा जाएगा कि किडनी आवंटन की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार हुई या नहीं.
इस जांच में केवल अस्पतालों और ट्रांसप्लांट सिस्टम से जुड़े अधिकारियों की भूमिका ही नहीं, बल्कि वेटिंग लिस्ट में शामिल मरीजों से भी पूछताछ की जा सकती है. इसका उद्देश्य यह पता लगाना होगा कि मरीजों को किडनी आवंटन से पहले या बाद में किसी तरह की अनुचित मांग, भुगतान या अन्य दबाव का सामना तो नहीं करना पड़ा.
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आखिर क्या है पूरा विवाद?
अंगदान के बाद मिलने वाले अंगों का आवंटन बेहद संवेदनशील प्रक्रिया होती है. इसमें मरीज की मेडिकल स्थिति, रजिस्ट्रेशन, प्राथमिकता और निर्धारित सिस्टम के आधार पर अंग आवंटित किए जाते हैं.
यही वजह है कि अगर वेटिंग लिस्ट में पीछे रहने वाले किसी मरीज को प्राथमिकता वाले मरीज से पहले किडनी मिलती है, तो यह गंभीर सवाल खड़ा करता है कि आखिर आवंटन की प्रक्रिया में क्या हुआ.
मध्य प्रदेश में सामने आए इस मामले में भी सवाल इसी प्रक्रिया को लेकर हैं. रिपोर्ट के अनुसार, 13 अगस्त को प्रकाशित खबर में इस कथित किडनी घोटाले का खुलासा किया गया था. इसके बाद NOTTO ने मामले को संज्ञान में लेते हुए जांच की दिशा में कदम बढ़ाया है.
जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह होगा कि किडनी किस मरीज के लिए उपलब्ध हुई, उस समय वेटिंग लिस्ट में कौन-कौन से मरीज थे और किस आधार पर अंतिम मरीज का चयन किया गया.
24 मार्च की घटना से उठे सवाल
रिपोर्ट में 24 मार्च 2026 की एक घटना का उल्लेख किया गया है, जो इस पूरे विवाद को समझने के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
जानकारी के मुताबिक, 24 मार्च को शाम करीब 4:43 बजे SOTO MP के ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर ने किडनी ट्रांसप्लांट के लिए रजिस्टर्ड 18 मरीजों की हॉस्पिटल वाइज प्रायोरिटी स्कोर के आधार पर वेटिंग लिस्ट जारी की.
इसके कुछ ही मिनट बाद स्थिति बदल गई.
रिपोर्ट के अनुसार, करीब 4:57 बजे वेटिंग लिस्ट में तीसरे और चौथे स्थान पर रहने वाले मरीजों के लिए संबंधित अस्पतालों ने किडनी लेने से इनकार कर दिया. इसके बाद लगभग 13 मिनट के भीतर, शाम 5:10 बजे, वेटिंग लिस्ट में शामिल अन्य अस्पतालों ने भी ट्रांसप्लांट सर्जरी के लिए मरीज स्वीकार करने से इनकार कर दिया.
यह घटनाक्रम जांच के लिहाज से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इतने कम समय में कई अस्पतालों द्वारा अंग स्वीकार करने से इनकार किए जाने और उसके बाद किडनी के आवंटन की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े हुए हैं.
अब जांच एजेंसी यह देख सकती है कि अस्पतालों द्वारा मरीजों को स्वीकार न करने के पीछे वास्तविक चिकित्सकीय कारण क्या थे और क्या इनकार की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुरूप थी.
मरीजों से भी होगी पूछताछ
इस मामले में सबसे अहम बात यह है कि जांच केवल सरकारी रिकॉर्ड और अस्पतालों तक सीमित नहीं रहने वाली है.
रिपोर्ट के अनुसार, वेटिंग लिस्ट में शामिल मरीजों के बयान भी लिए जाएंगे. इसके पीछे उद्देश्य यह पता लगाना है कि मरीजों या उनके परिवारों से किडनी ट्रांसप्लांट के नाम पर किसी तरह के पैसे की मांग तो नहीं की गई.
रिपोर्ट में SOTO MP के अधिकारियों के हवाले से यह भी बताया गया है कि मामले की जांच के दौरान वेटिंग लिस्ट के मरीजों के बयान लिए जाएंगे.
यानी अब जांच का एक महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि क्या किसी मरीज को किडनी मिलने के लिए पैसे देने या किसी अन्य प्रकार की अनुचित व्यवस्था करने के लिए कहा गया था?
हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी. फिलहाल सामने आई जानकारी के आधार पर इसे कथित अनियमितता के रूप में ही देखा जाना चाहिए.
4-5 लाख रुपये रखने की बात का भी जिक्र
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि रिपोर्ट में एक मरीज के परिजन से कथित तौर पर 4-5 लाख रुपये खाते में रखने के लिए कहे जाने की बात सामने आई है.
रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले की जांच की सिफारिश की गई है.
अगर जांच में यह आरोप सही पाया जाता है कि किसी मरीज या उसके परिजन से अंग आवंटन के बदले पैसे की मांग की गई या भुगतान की व्यवस्था करने के लिए कहा गया, तो यह बेहद गंभीर मामला होगा.
अंगदान का उद्देश्य किसी जरूरतमंद व्यक्ति को जीवन का दूसरा अवसर देना है. ऐसे में अगर आर्थिक क्षमता के आधार पर किसी मरीज की प्राथमिकता प्रभावित होती है, तो यह पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा सवाल होगा.
दो बार फोन करने का भी मामला
रिपोर्ट में मंदसौर की एक महिला मरीज का भी उल्लेख है, जिसे खबर में परिवर्तित नाम से बताया गया है. उसे किडनी ट्रांसप्लांट के लिए वेटिंग लिस्ट में रखा गया था.
रिपोर्ट के मुताबिक, SOTO MP के ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर की ओर से मरीज को दो बार फोन किया गया. कथित तौर पर बातचीत के दौरान मरीज के परिजन से पूछा गया कि वे क्यों चीटिंग कर रहे हैं.
इसके अलावा, मरीज के परिजन ने यह भी आरोप लगाया कि मरीज को ट्रांसप्लांट के लिए अस्पताल में भर्ती किया गया था, लेकिन बिना ऑपरेशन किए डिस्चार्ज कर दिया गया.
परिजन का कहना था कि उन्हें बताया गया कि मरीज के फोन पर जवाब नहीं दिया जा रहा है.
इन आरोपों की भी अब जांच की जरूरत है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मरीज को अस्पताल से डिस्चार्ज करने का वास्तविक चिकित्सकीय कारण क्या था और पूरे मामले में संबंधित रिकॉर्ड क्या कहते हैं.
किडनी ट्रांसप्लांट सिस्टम में पारदर्शिता क्यों जरूरी?
किडनी ट्रांसप्लांट केवल एक मेडिकल प्रक्रिया नहीं है. यह उस मरीज और उसके परिवार के लिए जीवन-मृत्यु के बीच का सवाल होता है, जो लंबे समय से अंग मिलने का इंतजार कर रहा होता है.
कैडेवर डोनेशन यानी ब्रेन-डेड डोनर से प्राप्त अंगों की संख्या सीमित होती है. वहीं दूसरी ओर, जरूरतमंद मरीजों की संख्या काफी अधिक हो सकती है.
ऐसे में हर उपलब्ध किडनी का सही और निष्पक्ष आवंटन बेहद जरूरी हो जाता है.
यदि वेटिंग लिस्ट तैयार करने और अंग आवंटन की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं होगी, तो मरीजों के बीच असमानता पैदा हो सकती है. इससे न केवल जरूरतमंद मरीजों का भरोसा टूटेगा, बल्कि अंगदान जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक अभियान पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है.
NOTTO की जांच से क्या सामने आ सकता है?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि NOTTO की जांच में क्या सामने आता है.
जांच में कई बिंदुओं पर ध्यान दिया जा सकता है—
- उस समय वेटिंग लिस्ट में कितने मरीज थे?
- मरीजों की प्राथमिकता किस आधार पर तय की गई?
- किस मरीज को किडनी आवंटित की गई?
- प्राथमिकता क्रम में कोई बदलाव हुआ या नहीं?
- अस्पतालों ने किन कारणों से किडनी लेने से इनकार किया?
- इनकार की जानकारी सिस्टम में कब दर्ज की गई?
- मरीजों या उनके परिजनों से पैसों की मांग किए जाने का कोई प्रमाण है या नहीं?
- ट्रांसप्लांट से जुड़े अधिकारियों और अस्पतालों के बीच हुई बातचीत क्या थी?
- पूरे मामले में निर्धारित SOP और नियमों का पालन हुआ या नहीं?
इन सवालों के जवाब इस मामले की वास्तविक तस्वीर सामने लाने में महत्वपूर्ण होंगे.
सिर्फ एक अस्पताल नहीं, पूरी प्रक्रिया की होगी परीक्षा
इस मामले को केवल किसी एक अस्पताल की कथित लापरवाही या अनियमितता के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा. यदि जांच में गड़बड़ी की पुष्टि होती है, तो यह सवाल भी उठेगा कि सिस्टम में ऐसी स्थिति बनने से रोकने के लिए निगरानी की व्यवस्था कितनी मजबूत है.
ऑर्गन अलॉटमेंट सिस्टम में डिजिटल रिकॉर्ड, मरीज की प्राथमिकता, अस्पताल की उपलब्धता और अंग स्वीकार करने की स्थिति जैसी जानकारी महत्वपूर्ण होती है. इसलिए किसी भी तरह की शिकायत सामने आने पर इन सभी रिकॉर्ड का मिलान किया जाना जरूरी है.
अगर किसी स्तर पर प्रक्रिया में बदलाव किया गया है, तो यह पता लगाना भी जरूरी होगा कि वह बदलाव किसके निर्देश पर हुआ और उसका आधार क्या था.
जांच के बाद ही साफ होगी सच्चाई
फिलहाल इस पूरे मामले में कई गंभीर आरोप और सवाल सामने आए हैं, लेकिन आरोपों को अंतिम सच मानना उचित नहीं होगा. इसकी वास्तविकता जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी.
NOTTO की जांच से यह पता चल सकेगा कि किडनी आवंटन की प्रक्रिया में वास्तव में कोई अनियमितता हुई थी या नहीं. साथ ही यह भी सामने आ सकता है कि मरीजों को किडनी मिलने में देरी या इनकार के पीछे वास्तविक चिकित्सकीय कारण क्या थे.,
इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि जांच निष्पक्ष और दस्तावेजों के आधार पर हो. क्योंकि यहां सवाल केवल किसी एक मरीज या अस्पताल का नहीं है, बल्कि उन तमाम लोगों का है जो अंगदान की व्यवस्था पर भरोसा करके जीवन बचने की उम्मीद रखते हैं.
अंगदान के भरोसे को बचाना जरूरी
भारत में अंगदान को लेकर जागरूकता लगातार बढ़ाने की कोशिश की जा रही है. हजारों परिवार अपने प्रियजनों के ब्रेन-डेड होने के बाद उनके अंगदान का कठिन फैसला लेते हैं ताकि किसी दूसरे व्यक्ति को जीवन मिल सके.
ऐसे में अंगों के आवंटन को लेकर यदि कोई सवाल उठता है, तो उसका जवाब पारदर्शी तरीके से मिलना बेहद जरूरी है.
किडनी किसी की आर्थिक ताकत से नहीं, बल्कि निर्धारित नियमों और मेडिकल जरूरत के आधार पर मिलनी चाहिए. वेटिंग लिस्ट का उद्देश्य ही यह सुनिश्चित करना है कि सीमित उपलब्ध अंगों का आवंटन निष्पक्ष तरीके से हो.
अब सबकी नजर NOTTO की जांच पर है. जांच यह बताएगी कि मध्य प्रदेश में सामने आया किडनी अलॉटमेंट विवाद आखिर कितनी बड़ी अनियमितता है और इसके पीछे जिम्मेदारी किसकी तय होती है.
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