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Toggleझारखंड: JPSC-JSSC परीक्षा में छेड़छाड़ का आरोप, 300 अभ्यर्थियों को पास कराने का दावा
झारखंड में सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. JPSC और JSSC की परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी और OMR शीट में छेड़छाड़ के आरोप सामने आने के बाद परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बहस तेज हो गई है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, जांच के दौरान परीक्षा एजेंसी से जुड़े एक कर्मचारी ने करीब 300 अभ्यर्थियों को पैसे लेकर पास कराने का दावा किया है.
इस खुलासे ने उन हजारों अभ्यर्थियों की चिंता बढ़ा दी है, जो वर्षों की मेहनत, कोचिंग और आर्थिक संघर्ष के बाद सरकारी नौकरी की परीक्षाओं में शामिल होते हैं. सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर परीक्षा की OMR शीट या ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रक्रिया में किसी स्तर पर हेरफेर संभव है, तो पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता कैसे सुनिश्चित की जाएगी?
हालांकि, इस मामले में सामने आए आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी. इसलिए फिलहाल इसे आरोप और जांच के स्तर पर सामने आया मामला माना जाना चाहिए.
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OMR और ऑन-स्क्रीन मार्किंग में छेड़छाड़ का आरोप
रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड लोक सेवा आयोग यानी JPSC की परीक्षाओं में कथित तौर पर OMR शीट और ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम में हेरफेर की गई. बताया गया है कि परीक्षा प्रक्रिया से जुड़ी एजेंसी के कर्मचारियों से पूछताछ के दौरान इस संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई.
OMR शीट प्रतियोगी परीक्षाओं में अभ्यर्थियों के उत्तर दर्ज करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम होती है. परीक्षा समाप्त होने के बाद इन शीट को स्कैन कर कंप्यूटर आधारित सिस्टम के जरिए मूल्यांकन किया जाता है.इसी तरह कुछ परीक्षाओं में ऑन-स्क्रीन मार्किंग यानी डिजिटल माध्यम से उत्तरों की जांच और अंक निर्धारण किया जाता है.
ऐसे में यदि इन प्रक्रियाओं में किसी तरह की अनधिकृत छेड़छाड़ होती है, तो इसका सीधा असर अभ्यर्थियों के परिणाम पर पड़ सकता है.
यही वजह है कि इस मामले में सामने आया कथित खुलासा बेहद गंभीर माना जा रहा है.
करीब 300 अभ्यर्थियों को पास कराने का दावा
रिपोर्ट में परीक्षा एजेंसी से जुड़े कर्मचारी के बयान का हवाला देते हुए कहा गया है कि करीब 300 अभ्यर्थियों को पैसे लेकर पास कराने का दावा सामने आया है.
बताया गया है कि इन अभ्यर्थियों को अलग-अलग परीक्षाओं में कथित तौर पर लाभ पहुंचाया गया. इनमें फॉरेस्ट ऑफिसर परीक्षा, JPSC की 14वीं सिविल सेवा परीक्षा और एक अन्य परीक्षा के अभ्यर्थियों की संख्या शामिल होने की बात कही गई है.
रिपोर्ट के अनुसार, इनमें करीब 100 अभ्यर्थी फॉरेस्ट ऑफिसर परीक्षा, करीब 100 अभ्यर्थी JPSC की 14वीं सिविल सेवा परीक्षा और करीब 100 अभ्यर्थी अन्य परीक्षा से जुड़े बताए गए हैं.
अगर जांच में यह दावा सही साबित होता है, तो मामला केवल कुछ अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहेगा. इससे पूरी भर्ती प्रक्रिया और उससे जुड़े संस्थानों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं.
परीक्षा एजेंसी के कर्मचारियों पर भी सवाल
इस पूरे मामले में परीक्षा कराने वाली एजेंसी के कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई जा रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, पूछताछ के दौरान एजेंसी के कुछ कर्मचारियों के नाम सामने आए हैं, जिन पर OMR और ऑन-स्क्रीन मार्किंग से जुड़ी प्रक्रिया में कथित हेरफेर करने का आरोप है.
यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल सिस्टम की सुरक्षा का है.
सरकारी भर्ती परीक्षाओं में लाखों युवा अपना भविष्य दांव पर लगाते हैं. ऐसे में परीक्षा से लेकर परिणाम तैयार होने तक हर स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था बेहद मजबूत होना जरूरी है. प्रश्नपत्र की सुरक्षा, परीक्षा केंद्र की निगरानी, OMR शीट का रिकॉर्ड, स्कैनिंग, मूल्यांकन और रिजल्ट तैयार करने की प्रक्रिया—हर चरण में पारदर्शिता आवश्यक है.
यदि किसी एक चरण में भी अनधिकृत व्यक्ति की पहुंच बनती है, तो पूरी चयन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है.
CBI जांच में भी पूछताछ का जिक्र
रिपोर्ट के दूसरे हिस्से में केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा JPSC के पूर्व सदस्य डॉ. जमाल से पूछताछ किए जाने का भी उल्लेख है. पूछताछ में परीक्षा प्रक्रिया और एजेंसी से जुड़े कथित लेनदेन या आरोपों के बारे में सवाल किए जाने की बात सामने आई है.
रिपोर्ट के मुताबिक, टीडीपीएल के मार्केटिंग मैनेजर अभय तिवारी द्वारा लगाए गए कुछ आरोपों को लेकर भी पूछताछ हुई. वहीं, डॉ. जमाल ने कथित आरोपों को खारिज करते हुए किसी भी बिचौलिए से संबंध होने से इनकार किया.
यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जांच में केवल परीक्षा एजेंसी के कर्मचारियों की भूमिका ही नहीं, बल्कि उन सभी लोगों की भूमिका देखी जा सकती है जिनका परीक्षा प्रक्रिया से किसी भी स्तर पर संबंध रहा हो.
हालांकि, किसी व्यक्ति पर आरोप लगना और आरोप साबित होना दो अलग-अलग बातें हैं. इसलिए जांच पूरी होने से पहले किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा.
मेहनत करने वाले अभ्यर्थियों के लिए सबसे बड़ा सवाल
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए सरकारी नौकरी सिर्फ एक रोजगार नहीं होती. इसके पीछे कई वर्षों की मेहनत, आर्थिक निवेश और परिवार की उम्मीदें जुड़ी होती हैं.
एक अभ्यर्थी कई बार तीन से पांच साल तक लगातार तैयारी करता है. दिन-रात पढ़ाई, कोचिंग फीस, किताबें, रहने और खाने का खर्च—इन सबके बाद वह परीक्षा में बैठता है. ऐसे में यदि चयन प्रक्रिया में किसी प्रकार की गड़बड़ी की आशंका सामने आती है, तो उसका भरोसा टूटना स्वाभाविक है.
सबसे बड़ी समस्या यह है कि परीक्षा में सफल और असफल होने के बीच अंतर कई बार केवल कुछ अंकों का होता है. यदि किसी योग्य अभ्यर्थी के स्थान पर किसी दूसरे व्यक्ति को कथित रूप से अनुचित तरीके से लाभ मिलता है, तो इसका असर केवल एक सीट पर नहीं पड़ता.
एक सीट किसी वास्तविक योग्य उम्मीदवार के अवसर का प्रतिनिधित्व करती है.
क्या होगी जांच की दिशा?
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि जांच किस दिशा में आगे बढ़ेगी.
यदि OMR शीट और डिजिटल मार्किंग सिस्टम में छेड़छाड़ के आरोपों की जांच की जा रही है, तो जांच एजेंसियों के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल होंगे.
सबसे पहले यह पता लगाना होगा कि किन परीक्षाओं में कथित अनियमितता हुई. इसके बाद संबंधित अभ्यर्थियों की सूची, परीक्षा परिणाम, OMR रिकॉर्ड, डिजिटल डेटा और मूल्यांकन प्रक्रिया की जांच करनी होगी.
यह भी पता लगाना जरूरी होगा कि किसी अभ्यर्थी के अंक परीक्षा के मूल रिकॉर्ड से अलग तो नहीं किए गए. इसके लिए डिजिटल लॉग, सर्वर डेटा, स्कैन की गई OMR शीट और अंतिम परिणाम के बीच मिलान किया जा सकता है.
साथ ही यह भी जांचना जरूरी होगा कि परीक्षा एजेंसी के कर्मचारियों को किस स्तर तक सिस्टम की पहुंच प्राप्त थी और क्या उस पहुंच का किसी गलत उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया गया.
जांच के साथ पारदर्शिता भी जरूरी
इस मामले में केवल जांच शुरू कर देना पर्याप्त नहीं होगा. जांच की प्रक्रिया और उसके परिणामों को लेकर भी पर्याप्त पारदर्शिता जरूरी है.
अभ्यर्थियों को यह भरोसा मिलना चाहिए कि जांच निष्पक्ष तरीके से होगी और यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी साबित होती है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाएगी.
यदि किसी परीक्षा का परिणाम वास्तव में प्रभावित पाया जाता है, तो सरकार और संबंधित आयोग को प्रभावित अभ्यर्थियों के हितों को ध्यान में रखते हुए उचित कदम उठाने होंगे.
वहीं, यदि जांच में आरोप गलत साबित होते हैं, तो इसकी जानकारी भी स्पष्ट रूप से सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि बिना वजह किसी परीक्षा या संस्था की विश्वसनीयता प्रभावित न हो.
भर्ती परीक्षाओं में तकनीक के साथ मजबूत निगरानी जरूरी
आज प्रतियोगी परीक्षाओं में तकनीक का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है. OMR स्कैनिंग से लेकर डिजिटल मूल्यांकन तक कई प्रक्रियाएं कंप्यूटर आधारित हो चुकी हैं.
तकनीक से परीक्षा प्रक्रिया तेज और अधिक व्यवस्थित हो सकती है, लेकिन इसके साथ साइबर सुरक्षा और डेटा सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है.
हर संवेदनशील प्रक्रिया में मल्टी-लेयर सिक्योरिटी, डिजिटल लॉग, ऑडिट ट्रेल और स्वतंत्र निगरानी की व्यवस्था होनी चाहिए. किसी भी कर्मचारी को अकेले ऐसी संवेदनशील प्रक्रिया तक पूर्ण पहुंच नहीं मिलनी चाहिए.
इसके अलावा परीक्षा के बाद डेटा को सुरक्षित रखने और जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र ऑडिट कराने की व्यवस्था भी होनी चाहिए.
अभ्यर्थियों की मांग भी अहम
रांची में छात्रों द्वारा परीक्षा में कथित गड़बड़ी की जांच की मांग किए जाने की बात भी रिपोर्ट में सामने आई है. छात्रों की मांग का मूल सवाल यही है कि भर्ती परीक्षा में यदि किसी तरह की अनियमितता हुई है, तो उसका निष्पक्ष तरीके से पता लगाया जाए.
युवाओं का यह सवाल लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूरी तरह जायज है.
सरकारी भर्ती परीक्षा का आधार ही भरोसा है. अभ्यर्थी परीक्षा में इसलिए बैठता है क्योंकि उसे विश्वास होता है कि उसका मूल्यांकन उसकी योग्यता के आधार पर होगा. यदि इस भरोसे में दरार आती है, तो उसका असर पूरी व्यवस्था पर पड़ता है.
अब आगे क्या?
फिलहाल इस मामले में सबसे ज्यादा नजर जांच की दिशा और उसके निष्कर्ष पर रहेगी. क्या वास्तव में OMR और ऑन-स्क्रीन मार्किंग में छेड़छाड़ हुई? क्या करीब 300 अभ्यर्थियों को कथित रूप से अनुचित लाभ पहुंचाया गया? क्या परीक्षा एजेंसी के कर्मचारियों की इसमें कोई भूमिका थी? और यदि आरोप सही हैं, तो इस पूरे नेटवर्क में कौन-कौन लोग शामिल थे?
इन सभी सवालों का जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट होगा.
लेकिन इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या सरकारी भर्ती परीक्षाओं की मौजूदा व्यवस्था युवाओं के भरोसे को पूरी तरह सुरक्षित रख पा रही है?
झारखंड ही नहीं, देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर युवाओं की सबसे बड़ी मांग एक ही है—परीक्षा निष्पक्ष हो, मूल्यांकन पारदर्शी हो और चयन केवल योग्यता के आधार पर हो.
क्योंकि सरकारी नौकरी की एक सीट केवल एक पद नहीं होती. उसके पीछे किसी युवा के वर्षों का संघर्ष, उसके परिवार की उम्मीद और उसके बेहतर भविष्य का सपना जुड़ा होता है.
इसलिए यदि किसी भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी का आरोप सामने आता है, तो उसकी निष्पक्ष और समयबद्ध जांच केवल कानूनी आवश्यकता नहीं, बल्कि लाखों अभ्यर्थियों के विश्वास को बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है.
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