Skip to main content

Vindhya First

मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश में पति ह*त्या के 36 मामले, हेल्पलाइन पर 12,577 कॉल

MP में 6 महीने में पति हत्या के 36 मामले सामने आए. वहीं पुरुष हेल्पलाइन पर 12,577 कॉल पहुंचे. आखिर इन आंकड़ों के पीछे की पूरी कहानी क्या है? जानिए इस रिपोर्ट में

मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश में पति ह*त्या के 36 मामले, हेल्पलाइन पर 12,577 कॉल

मध्य प्रदेश में वैवाहिक विवाद और पुरुषों से जुड़ी शिकायतों को लेकर सामने आए आंकड़े एक गंभीर सामाजिक बहस की ओर इशारा कर रहे हैं. एक प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के पहले छह महीनों में देशभर में पति की हत्या के 322 मामले सामने आए, जिनमें मध्य प्रदेश 36 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर रहा. इसी अवधि में आत्महत्या के 232 मामले भी दर्ज किए जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है.

इसी रिपोर्ट में पुरुष अधिकारों से जुड़े संगठनों की हेल्पलाइन के आंकड़ों का भी उल्लेख है. इसके अनुसार, 2026 के शुरुआती छह महीनों में मध्य प्रदेश से हेल्पलाइन पर 12,577 कॉल पहुंचे. इन कॉल में बड़ी संख्या ऐसे पुरुषों की बताई गई है, जो वैवाहिक विवाद, घरेलू तनाव या कानूनी परेशानियों से जुड़ी मदद मांग रहे थे.

इन आंकड़ों ने एक अहम सवाल खड़ा किया है—क्या वैवाहिक विवादों में पुरुषों की समस्याएं भी उतनी ही गंभीरता से सुनी जा रही हैं, जितनी महिलाओं की शिकायतों को सुना जाता है?

यह भी पढ़ें: मध्य प्रदेश: वेटिंग लिस्ट में गड़बड़ी के आरोप, गरीब मरीजों के अधिकार पर सवाल

पति की हत्या के मामलों में मध्य प्रदेश दूसरे नंबर पर

रिपोर्ट के अनुसार, 2026 के पहले छह महीनों में देश में पति की हत्या के 322 मामले सामने आए. इनमें मध्य प्रदेश में 36 मामले दर्ज किए गए। इस आंकड़े के साथ प्रदेश देश में दूसरे स्थान पर बताया गया है, जबकि पहले स्थान पर 93 मामलों वाला राज्य है.

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इन मामलों में लगभग 60 प्रतिशत की वजह वैवाहिक संबंधों से जुड़ी बताई गई है.

यह आंकड़ा सिर्फ अपराध का विषय नहीं है, बल्कि यह वैवाहिक रिश्तों में बढ़ते तनाव, विवाद, घरेलू संघर्ष और संवाद की कमी जैसे सामाजिक पहलुओं पर भी सवाल खड़े करता है.

हालांकि, किसी भी आंकड़े को देखते समय यह समझना जरूरी है कि पति की हत्या के सभी मामलों को केवल वैवाहिक विवाद से जोड़ना उचित नहीं होगा. हत्या के पीछे संपत्ति विवाद, व्यक्तिगत दुश्मनी, आपराधिक साजिश, आर्थिक कारण या अन्य परिस्थितियां भी हो सकती हैं. इसलिए प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को अलग-अलग समझना जरूरी है.

हेल्पलाइन पर एमपी से 12,577 कॉल

रिपोर्ट का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा पुरुष अधिकारों से जुड़ी हेल्पलाइन पर आने वाले कॉल हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के पहले छह महीनों में मध्य प्रदेश से 12,577 कॉल हेल्पलाइन तक पहुंचे. इन कॉल के पीछे अलग-अलग तरह की शिकायतें और पारिवारिक समस्याएं बताई गई हैं.

हेल्पलाइन से जुड़े संगठनों का दावा है कि कई पुरुष वैवाहिक विवादों, घरेलू तनाव और कानूनी प्रक्रियाओं से परेशान होकर मदद की तलाश करते हैं.

इन आंकड़ों को लेकर एक जरूरी सावधानी भी है. हेल्पलाइन पर आया हर कॉल किसी अपराध या झूठे केस की पुष्टि नहीं करता. यह केवल इतना बताता है कि किसी व्यक्ति ने सहायता या सलाह के लिए संपर्क किया. इसलिए इन कॉल को सीधे तौर पर वास्तविक अपराधों की संख्या मानना सही नहीं होगा.

फिर भी, इतनी बड़ी संख्या में मदद की मांग इस बात का संकेत जरूर है कि पुरुषों से जुड़ी मानसिक, सामाजिक और कानूनी परेशानियों पर भी सार्वजनिक चर्चा की जरूरत है.

2025 में 58,289 कॉल, 2026 में बढ़ी संख्या

रिपोर्ट में पुरुष अधिकार संगठनों के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि 2025 में देशभर से करीब 58,289 कॉल इन संगठनों की हेल्पलाइन तक पहुंचे थे.

वहीं, 2026 के शुरुआती छह महीनों में ही यह संख्या 87,969 कॉल तक पहुंचने की बात रिपोर्ट में कही गई है.

इन आंकड़ों में बढ़ोतरी के कई कारण हो सकते हैं. पुरुषों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ना, सोशल मीडिया के जरिए हेल्पलाइन की जानकारी फैलना, कानूनी सहायता की जरूरत और वैवाहिक विवादों में बढ़ती सार्वजनिक बहस इसके संभावित कारण हो सकते हैं.

इसलिए केवल कॉल की संख्या बढ़ने को सीधे तौर पर पारिवारिक विवादों में वृद्धि का प्रमाण नहीं माना जा सकता. इसके लिए पुलिस रिकॉर्ड, न्यायालयीन मामलों और स्वतंत्र सामाजिक अध्ययन जैसे कई स्रोतों को साथ देखकर निष्कर्ष निकालना जरूरी होगा.

राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग को लेकर आंदोलन

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग को लेकर आंदोलन तेज हो रहा है. पुरुष अधिकारों से जुड़े संगठनों का तर्क है कि महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों के लिए अलग-अलग संस्थागत व्यवस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन पुरुषों की शिकायतों और अधिकारों के लिए भी एक प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए.

पुरुष अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि वैवाहिक विवादों में पुरुषों की शिकायतों को भी निष्पक्ष तरीके से सुना जाना चाहिए.

यह बहस लंबे समय से चली आ रही है. एक पक्ष जहां पुरुषों के लिए संस्थागत सहायता की जरूरत पर जोर देता है, वहीं दूसरी ओर महिला अधिकार संगठनों का तर्क है कि घरेलू हिंसा और लैंगिक अपराधों की वास्तविकता को देखते हुए महिलाओं के लिए मौजूद कानूनी सुरक्षा को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए.

इसलिए इस मुद्दे को महिला बनाम पुरुष के नजरिए से देखने के बजाय न्याय और समानता के नजरिए से देखना ज्यादा जरूरी है.

वैवाहिक विवादों की असली चुनौती क्या है?

पति-पत्नी के बीच विवाद किसी एक कारण से पैदा नहीं होते. आर्थिक दबाव, पारिवारिक हस्तक्षेप, संपत्ति विवाद, विश्वास की कमी, घरेलू जिम्मेदारियों को लेकर मतभेद, मानसिक तनाव और संवाद की कमी जैसे कई कारण रिश्तों में तनाव पैदा कर सकते हैं.

कई मामलों में विवाद इतना बढ़ जाता है कि पति-पत्नी अलग रहने लगते हैं या मामला पुलिस और अदालत तक पहुंच जाता है.

ऐसे मामलों में सबसे जरूरी है कि शिकायत की निष्पक्ष जांच हो. अगर किसी महिला के साथ हिंसा या उत्पीड़न हुआ है तो उसे न्याय और सुरक्षा मिलनी चाहिए. वहीं, अगर किसी पुरुष के साथ भी हिंसा, धमकी, ब्लैकमेलिंग या अन्याय हुआ है तो उसकी शिकायत को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए.

कानून का उद्देश्य किसी एक लिंग को फायदा पहुंचाना नहीं, बल्कि पीड़ित व्यक्ति को न्याय दिलाना होना चाहिए.

आंकड़ों के पीछे इंसानी कहानियां

रिपोर्ट में पुरुषों की समस्याओं को लेकर कई मामलों का जिक्र किया गया है. हेल्पलाइन से जुड़े लोगों का कहना है कि कई पुरुष ऐसी परिस्थितियों में फंस जाते हैं, जहां उन्हें परिवार, समाज और कानूनी प्रक्रिया के बीच मानसिक दबाव का सामना करना पड़ता है.

समस्या यह भी है कि पुरुषों से अक्सर यह उम्मीद की जाती है कि वे अपनी परेशानियों को खुद संभाल लेंगे. सामाजिक रूप से पुरुषों को भावनाएं व्यक्त करने या मदद मांगने से रोकने वाली सोच भी कई बार स्थिति को और मुश्किल बना देती है.

यही वजह है कि पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य, कानूनी सहायता और पारिवारिक परामर्श जैसे विषयों पर खुलकर बातचीत जरूरी है.

क्या पुरुषों के लिए अलग आयोग समाधान है?

राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग के समर्थक इसे पुरुषों की शिकायतों के लिए एक संस्थागत मंच के रूप में देखते हैं. उनका मानना है कि पुरुषों से जुड़े मामलों के लिए एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जहां वे बिना सामाजिक दबाव के अपनी शिकायत दर्ज करा सकें और उचित कानूनी सलाह प्राप्त कर सकें.

लेकिन किसी नए आयोग की जरूरत और उसकी उपयोगिता पर व्यापक कानूनी और सामाजिक चर्चा जरूरी होगी.

सवाल यह भी है कि क्या मौजूदा संस्थाओं में सुधार करके पुरुषों की शिकायतों के लिए बेहतर व्यवस्था बनाई जा सकती है या एक अलग संस्था की जरूरत है.

इसका जवाब भावनात्मक बहस से नहीं, बल्कि डेटा, कानून और स्वतंत्र अध्ययन के आधार पर तय किया जाना चाहिए.

महिलाओं की सुरक्षा और पुरुषों के अधिकार—दोनों जरूरी

महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा और अपराध एक गंभीर सामाजिक समस्या हैं. इसी तरह पुरुषों के खिलाफ हिंसा, झूठे आरोप, मानसिक उत्पीड़न या किसी भी तरह का अन्याय भी गंभीर विषय है.

दोनों मुद्दों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने से समस्या का समाधान नहीं होगा.

जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें—

  • हर शिकायत की निष्पक्ष जांच हो.
  • वास्तविक पीड़ित को तुरंत सहायता मिले.
  • झूठी शिकायत पाए जाने पर कानून के मुताबिक कार्रवाई हो.
  • पुरुषों और महिलाओं दोनों को कानूनी सहायता उपलब्ध हो.
  • वैवाहिक विवादों में काउंसलिंग और मध्यस्थता की व्यवस्था मजबूत हो.
  • मानसिक स्वास्थ्य सहायता को भी गंभीरता से लिया जाए.

निष्कर्ष

मध्य प्रदेश में पति की हत्या के 36 मामलों और पुरुष अधिकार हेल्पलाइन पर पहुंचे 12,577 कॉल के आंकड़े निश्चित रूप से ध्यान खींचते हैं. लेकिन इन आंकड़ों को सनसनी के बजाय संवेदनशीलता और तथ्यपरकता के साथ समझने की जरूरत है.

हेल्पलाइन कॉल की संख्या शिकायतों की मौजूदगी दिखाती है, लेकिन वह अपने आप में अपराध या आरोप की पुष्टि नहीं करती. इसी तरह पति की हत्या के मामलों में भी प्रत्येक केस की परिस्थितियों की स्वतंत्र जांच जरूरी है.

असल सवाल यह नहीं होना चाहिए कि पुरुष ज्यादा पीड़ित हैं या महिलाएं. असली सवाल यह है कि जब भी कोई व्यक्ति घरेलू हिंसा, मानसिक उत्पीड़न या वैवाहिक विवाद का शिकार हो, तो क्या उसे समय पर और निष्पक्ष न्याय मिल रहा है?

यह भी पढ़ें: CJP: CJP अभी पार्टी नहीं बनेगी, संस्थापक अभिजीत दीपके बोले- “पार्टी बनते ही आसानी से तोड़ दी जाएगी