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रीवा: रौली पंचायत में बिरसा मुंडा जयंती पर भारी हंगामा, दोनों पक्षों ने लगाए गंभीर आरोप

बिरसा मुंडा जयंती कार्यक्रम में बवाल! जमीन विवाद को लेकर आमने-सामने आए दो पक्ष, पुलिस थाने तक पहुंचा मामला

रीवा: रौली पंचायत में बिरसा मुंडा जयंती पर भारी हंगामा, दोनों पक्षों ने लगाए गंभीर आरोप

रीवा: मध्य प्रदेश के रीवा जिले से एक बेहद संवेदनशील और तनावपूर्ण मामला सामने आया है. अतरैला थाना क्षेत्र के अंतर्गत भगवान बिरसा मुंडा जयंती कार्यक्रम के दौरान दो पक्षों में भारी विवाद हो गया. एक तरफ जहां स्थानीय ग्रामीणों ने जमीन पर अवैध कब्जे की कोशिश का गंभीर आरोप लगाया है, वहीं दूसरी तरफ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं के साथ अभद्रता, गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी दिए जाने की बात कही है.

इस घटना के बाद से क्षेत्र में वैचारिक और सामाजिक तनाव की स्थिति बनी हुई है. आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर उस दिन मुसलाहा गांव में क्या हुआ था और दोनों पक्षों के दावों में कितनी सच्चाई है.

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घटना की पृष्ठभूमि: रौली पंचायत के मुसलाहा गांव का मामला

यह पूरा विवाद मंगलवार को अतरैला थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत रौली के मुसलाहा गांव में भड़का. इस दिन देश के महान स्वतंत्रता सेनानी और आदिवासी नायक भगवान बिरसा मुंडा की जयंती के उपलक्ष्य में एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा था. इस कार्यक्रम का नेतृत्व मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) के स्थानीय पदाधिकारी और कार्यकर्ता कर रहे थे.

शुरुआती तौर पर कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से शुरू हुआ, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, यह आयोजन एक राजनीतिक और सामाजिक अखाड़े में तब्दील हो गया.

ग्रामीणों का आरोप: ‘जयंती की आड़ में जमीन कब्जे का प्रयास’

स्थानीय ग्रामीणों का रुख इस मामले में बेहद कड़ा है. ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि:

  • कार्यक्रम का आयोजन केवल एक बहाना था.

  • पार्टी के कुछ चुनिंदा पदाधिकारी और बाहरी लोग कार्यक्रम की आड़ में गांव की एक विवादित जमीन पर जबरन कब्जा करने की नीयत से पहुंचे थे.

  • जब ग्रामीणों को इस बात की भनक लगी, तो उन्होंने इसका कड़ा विरोध किया, जिसके कारण दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस हुई और स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई.

ग्रामीणों का कहना है कि वे किसी भी कीमत पर अपनी जमीनों पर अवैध कब्जा नहीं होने देंगे और उन्होंने प्रशासन से इस पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच की मांग की है.

माकपा नेता कांति दुबे का पलटवार: ‘आरोप बेबुनियाद, हमें मिली जान से मारने की धमकी’

दूसरी ओर, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता कांति दुबे ने ग्रामीणों द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को पार्टी को बदनाम करने की एक सोची-समझी साजिश करार दिया है.

कांति दुबे ने अपनी शिकायत में निम्नलिखित मुख्य बिंदु उठाए हैं:

1. शांतिपूर्ण आयोजन का दावा

कांति दुबे के अनुसार, भगवान बिरसा मुंडा जयंती का कार्यक्रम पूरी तरह से शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण माहौल में संपन्न हो चुका था. विवाद कार्यक्रम के दौरान नहीं, बल्कि उसके समाप्त होने के बाद शुरू हुआ जब कार्यकर्ता आपस में बैठकर भविष्य की योजनाओं पर चर्चा कर रहे थे.

2. अचानक हुआ हमला और अभद्रता

उन्होंने आरोप लगाया कि जब कार्यकर्ता चर्चा कर रहे थे, तभी कुछ असामाजिक तत्व और स्थानीय लोग वहां आ धमके. उन्होंने बिना किसी कारण के पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के साथ गाली-गलौज शुरू कर दी.

3. जान से मारने की धमकी और पुलिसिया कार्रवाई में देरी

माकपा नेता का कहना है कि विरोध करने पर उन्हें और उनके साथियों को जान से मारने की धमकी भी दी गई. कांति दुबे ने बताया:

“घटना के तुरंत बाद दोपहर करीब 2 बजे ही हम अपने कार्यकर्ताओं के साथ अतरैला थाना पहुंच गए थे. हम वहां लिखित शिकायत दर्ज कराने और एफआईआर (FIR) की मांग कर रहे थे, लेकिन पुलिस का रवैया उदासीन रहा और देर शाम तक हमारी रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई थी.”

पुलिस प्रशासन का रुख: जांच के बाद होगी वैधानिक कार्रवाई

इस हाई-प्रोफाइल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामले को लेकर अतरैला थाना पुलिस बेहद सतर्कता बरत रही है. दोनों पक्षों की ओर से भारी दबाव के बीच पुलिस ने संतुलन बनाने का प्रयास किया है.

स्थानीय थाना प्रभारी और पुलिस प्रशासन का कहना है कि:

  • दोनों पक्षों की ओर से शिकायतें और आवेदन प्राप्त हो चुके हैं.

  • मौके पर मौजूद गवाहों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर घटनाक्रम की बारीकी से जांच की जा रही है.

  • जांच पूरी होने के बाद जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसी के आधार पर निष्पक्ष रूप से आगे की वैधानिक व कानूनी कार्रवाई की जाएगी. पुलिस ने क्षेत्र में शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील की है.

निष्कर्ष: निष्पक्ष जांच की आवश्यकता

रीवा के मुसलाहा गांव की यह घटना इस बात का संकेत है कि ग्रामीण अंचलों में जमीन से जुड़े विवाद और राजनीतिक मतभेद किस कदर उग्र रूप ले सकते हैं. भगवान बिरसा मुंडा जैसे महान प्रतीक की जयंती पर ऐसा विवाद होना दुर्भाग्यपूर्ण है.

अब यह पूरी तरह से पुलिस और स्थानीय प्रशासन पर निर्भर करता है कि वे बिना किसी राजनीतिक दबाव के इस मामले की निष्पक्ष जांच करें, ताकि सच सामने आ सके और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सके.

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