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मध्यप्रदेश: 242 करोड़ की खरीद पर सवाल, 4 लाख की LED को 11 लाख में खरीदने का आरोप

4 लाख की LED को 11 लाख में खरीदने का आरोप! मध्यप्रदेश ट्रायबल विभाग के 242 करोड़ के टेंडर पर उठे बड़े सवाल। क्या सरकारी खरीद में हुआ बड़ा खेल? अब मामला पहुंचा CM और मुख्य सचिव तक!

मध्यप्रदेश: 242 करोड़ की खरीद पर सवाल, 4 लाख की LED को 11 लाख में खरीदने का आरोप

मध्यप्रदेश के ट्रायबल विभाग से जुड़ा एक बड़ा मामला सामने आया है, जिसने सरकारी खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. आरोप है कि विभाग द्वारा LED स्क्रीन, इंटरएक्टिव पैनल और कंप्यूटर उपकरणों की खरीद बाजार मूल्य से कई गुना ज्यादा कीमत पर की जा रही थी.

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा 95 इंच की LED स्क्रीन को लेकर हो रही है. शिकायत करने वाली कंपनियों का दावा है कि जिस LED स्क्रीन की बाजार कीमत करीब 4 लाख रुपए है, उसे लगभग 11 लाख रुपए में खरीदने की तैयारी की गई. यानी एक ही LED पर करीब 7 लाख रुपए अतिरिक्त खर्च किए जाने का आरोप है.

अब यह मामला सिर्फ खरीद प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सरकारी सिस्टम, टेंडर प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी बड़े सवाल खड़े कर रहा है.

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242 करोड़ के टेंडर पर उठे सवाल

सूत्रों के मुताबिक, ट्रायबल विभाग द्वारा जारी इस टेंडर की कुल कीमत करीब 242 करोड़ रुपए बताई जा रही है.

लेकिन शिकायत करने वाली कंपनियों का कहना है कि यही पूरा सामान लगभग 144 करोड़ रुपए में उपलब्ध कराया जा सकता था. अगर इन आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो सरकार को करीब 98 करोड़ रुपए तक का नुकसान होने की आशंका है.

यानी यह मामला सिर्फ महंगी खरीद का नहीं, बल्कि करोड़ों रुपए के संभावित आर्थिक नुकसान का भी बन गया है.

आखिर क्या खरीदा जाना था?

बताया जा रहा है कि इस टेंडर के तहत विभाग द्वारा कई डिजिटल और तकनीकी उपकरण खरीदे जाने थे, जिनमें शामिल हैं—

  • 95 इंच LED स्क्रीन
  • इंटरएक्टिव पैनल
  • कंप्यूटर सिस्टम
  • डिजिटल एजुकेशन उपकरण
  • स्मार्ट क्लास से जुड़े संसाधन

सरकार का उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों के स्कूलों और संस्थानों में डिजिटल सुविधाएं बढ़ाना बताया जा रहा है. लेकिन अब इसी खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं.

4 लाख की LED को 11 लाख में खरीदने का आरोप

पूरे विवाद का केंद्र 95 इंच की LED स्क्रीन बनी हुई है.

शिकायतकर्ताओं का दावा है कि बाजार में उपलब्ध समान तकनीक और फीचर्स वाली LED स्क्रीन की कीमत करीब 4 लाख रुपए है. इसके बावजूद विभागीय प्रक्रिया में उसी श्रेणी की LED के लिए लगभग 11 लाख रुपए तक का मूल्य तय किया गया.

अगर यह दावा सही साबित होता है, तो हर LED पर लगभग 7 लाख रुपए का अतिरिक्त बोझ सरकारी खजाने पर पड़ सकता है.

यही वजह है कि अब इस पूरे मामले को संभावित “रेट फिक्सिंग” और “ओवर प्राइसिंग” से जोड़कर देखा जा रहा है.

टेंडर प्रक्रिया पर भी गंभीर आरोप

मामले में शिकायत करने वाली कंपनियों ने सिर्फ महंगे रेट का ही आरोप नहीं लगाया, बल्कि टेंडर प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं.

आरोप है कि टेंडर की शर्तें इस तरह तैयार की गईं, जिससे कुछ चुनिंदा कंपनियों को फायदा पहुंचाया जा सके.

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि—

  • टेंडर में ऐसी तकनीकी शर्तें जोड़ी गईं जो सामान्य कंपनियां पूरी नहीं कर सकती थीं.
  • प्रतिस्पर्धा को सीमित करने की कोशिश की गई.
  • बाजार दरों की तुलना नहीं की गई.
  • रेट तय करने में पारदर्शिता नहीं रखी गई.

अगर जांच में ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला सरकारी खरीद प्रक्रिया में बड़ी अनियमितता माना जा सकता है.

मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव तक पहुंचा मामला

सूत्रों के मुताबिक, शिकायतकर्ता कंपनियों ने इस पूरे मामले की शिकायत मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव स्तर तक पहुंचाई है.

अब प्रशासनिक गलियारों में इस मुद्दे को लेकर हलचल तेज हो गई है. बताया जा रहा है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच की मांग भी उठने लगी है.

हालांकि अभी तक सरकार की तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है.

विपक्ष को मिला बड़ा मुद्दा

यह मामला सामने आने के बाद विपक्ष को सरकार पर हमला बोलने का बड़ा मौका मिल गया है.

विपक्षी दल अब इस मुद्दे को भ्रष्टाचार और सरकारी धन के दुरुपयोग से जोड़कर सरकार को घेरने की तैयारी कर रहे हैं.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर इस मामले में जांच शुरू होती है और आरोप सही साबित होते हैं, तो यह प्रदेश की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकता है.

सरकारी खरीद प्रक्रिया पर फिर उठे सवाल

मध्यप्रदेश में इससे पहले भी कई सरकारी खरीद प्रक्रियाओं को लेकर सवाल उठते रहे हैं..

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी विभागों में तकनीकी उपकरणों की खरीद के दौरान अक्सर बाजार कीमत और टेंडर कीमत में बड़ा अंतर देखने को मिलता है.

इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं—

  • सीमित प्रतिस्पर्धा
  • तकनीकी शर्तों का दुरुपयोग
  • मनमानी दरें
  • पारदर्शिता की कमी
  • निगरानी तंत्र की कमजोरी

ऐसे मामलों में सबसे बड़ा नुकसान सरकारी खजाने और टैक्स देने वाली जनता को उठाना पड़ता है.

आदिवासी शिक्षा के नाम पर सवाल

यह मामला इसलिए भी संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि यह ट्रायबल विभाग से जुड़ा हुआ है.

सरकार आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा और डिजिटल सुविधाओं को मजबूत करने के लिए लगातार योजनाएं चला रही है. ऐसे में अगर उन्हीं योजनाओं के नाम पर खरीद प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप लगते हैं, तो इससे योजनाओं की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ सकता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि आदिवासी छात्रों के लिए तकनीकी संसाधन जरूरी हैं, लेकिन खरीद प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और प्रतिस्पर्धात्मक होनी चाहिए.

सबसे बड़ा सवाल क्या है?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हो रहा है—

अगर बाजार में सस्ता और समान गुणवत्ता वाला सामान उपलब्ध था, तो फिर करोड़ों रुपए ज्यादा खर्च करने की जरूरत क्यों पड़ी?

क्या यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही है?
क्या रेट तय करने में गंभीर गलती हुई?
या फिर इसके पीछे कोई बड़ा खेल छिपा हुआ है?

फिलहाल इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आ पाएंगे.

सरकार की चुप्पी पर भी चर्चा

अब तक इस मामले में सरकार या ट्रायबल विभाग की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.

लेकिन जिस तरह यह मुद्दा राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में यह मामला और गर्मा सकता है.

पारदर्शिता ही सबसे बड़ा समाधान

विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे विवादों से बचने के लिए सरकारी खरीद प्रक्रिया में कुछ जरूरी सुधार किए जाने चाहिए—

  • ई-टेंडरिंग की सख्त निगरानी
  • बाजार मूल्य का स्वतंत्र मूल्यांकन
  • सभी कंपनियों को समान अवसर
  • खरीद प्रक्रिया का सार्वजनिक ऑडिट
  • तकनीकी शर्तों की निष्पक्ष समीक्षा

अगर ऐसा होता है, तो सरकारी धन की बचत के साथ-साथ जनता का भरोसा भी मजबूत होगा.

निष्कर्ष

मध्यप्रदेश के ट्रायबल विभाग में LED स्क्रीन और डिजिटल उपकरणों की खरीद को लेकर उठे सवाल अब सिर्फ एक विभागीय विवाद नहीं रह गए हैं.

242 करोड़ रुपए के टेंडर, 4 लाख की LED को 11 लाख में खरीदने के आरोप और करीब 98 करोड़ रुपए के संभावित नुकसान की आशंका ने पूरे मामले को बेहद गंभीर बना दिया है.

अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार इस मामले में क्या कदम उठाती है.

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