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मध्य प्रदेश: एमपी एथेनॉल चावल घोटाला,गरीबों के हक के चावल से 1160 करोड़ के कथित खेल की पूरी कहानी

मध्य प्रदेश के चर्चित कथित 1160 करोड़ रुपये के एथेनॉल चावल घोटाले में कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं. क्या सरकारी सिस्टम में बड़ी चूक हुई या फिर यह सुनियोजित खेल था? इस रिपोर्ट में जानिए पूरे मामले की टाइमलाइन, आरोप, जांच और अब तक क्या-क्या सामने आया

मध्य प्रदेश: एमपी एथेनॉल चावल घोटाला,गरीबों के हक के चावल से 1160 करोड़ के कथित खेल की पूरी कहानी

जिस फोर्टिफाइड चावल को सरकार गरीब बच्चों, गर्भवती महिलाओं और कुपोषण से जूझ रहे परिवारों तक बेहतर पोषण पहुंचाने के लिए तैयार करवाती है, आज वही चावल एक बड़े विवाद के केंद्र में है.

मध्य प्रदेश में सामने आए कथित 1160 करोड़ रुपये के एथेनॉल चावल घोटाले ने सरकारी व्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और निगरानी तंत्र पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. आरोप है कि एथेनॉल उत्पादन के लिए जारी किए गए सरकारी चावल का दुरुपयोग किया गया और नियमों का उल्लंघन कर करोड़ों रुपये का फायदा कमाया गया.

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि मामला अभी जांच के दायरे में है. कई एजेंसियां इसकी जांच कर रही हैं और अंतिम सच्चाई जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगी.

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आखिर एथेनॉल नीति क्या है?

देश में पेट्रोल पर निर्भरता कम करने और ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार लगातार एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दे रही है. इसी उद्देश्य से सरकारी गोदामों में लंबे समय से रखे अतिरिक्त (सरप्लस) चावल को एथेनॉल बनाने के लिए उपलब्ध कराने की नीति लागू की गई.

इस नीति के पीछे सरकार की सोच स्पष्ट थी—

  • गोदामों में रखा पुराना स्टॉक खराब होने से पहले उपयोग हो.
  • नई फसल रखने के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध हो.
  • एथेनॉल उत्पादन बढ़े.
  • कच्चे तेल के आयात पर देश की निर्भरता कम हो.

यानी यह योजना पर्यावरण और अर्थव्यवस्था—दोनों के लिए लाभकारी मानी गई.

पूरी कहानी की टाइमलाइन

14 फरवरी 2025

सरकार ने अतिरिक्त सरकारी चावल को एथेनॉल प्लांटों को देने की मंजूरी दी. इसकी शुरुआती कीमत लगभग 2250 रुपये प्रति क्विंटल तय की गई.

22 अक्टूबर 2025

सरकारी दर बढ़ाकर 2320 रुपये प्रति क्विंटल कर दी गई.

8 मई 2026

गोदामों के चयन का अधिकार भारतीय खाद्य निगम (FCI) को दिया गया. आरोप है कि इसी के बाद अनियमितताओं का सिलसिला शुरू हुआ.

फोर्टिफाइड चावल क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

फोर्टिफाइड चावल सामान्य चावल नहीं होता.

इसमें आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन B12 जैसे आवश्यक पोषक तत्व मिलाए जाते हैं ताकि एनीमिया और कुपोषण जैसी समस्याओं से लड़ने में मदद मिल सके.

सरकार इस चावल का उपयोग मुख्य रूप से—

  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS)
  • आंगनवाड़ी
  • मिड-डे मील
  • पोषण योजनाओं

में करती है.

यही वजह है कि इस चावल से जुड़ी किसी भी अनियमितता को बेहद गंभीर माना जाता है.

आरोप क्या हैं?

मीडिया रिपोर्टों और जांच से जुड़े दस्तावेजों के आधार पर आरोप है कि एथेनॉल उत्पादन के लिए रियायती दर पर दिया गया चावल कई मामलों में प्लांटों में इस्तेमाल ही नहीं हुआ.

आरोपों के अनुसार—

  • चावल खुले बाजार में बेच दिया गया.
  • कुछ राइस मिलों ने उसी चावल को दोबारा सरकारी बोरियों में भरकर सरकार को वापस जमा कर दिया.
  • कस्टम मिलिंग के नाम पर सरकारी भुगतान भी लिया गया.
  • असली धान का अलग से व्यापार कर अतिरिक्त लाभ कमाया गया.

यदि जांच में ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह एक ही सरकारी चावल से कई बार आर्थिक लाभ कमाने का मामला बन सकता है.

समझिए पूरा खेल आसान भाषा में

मान लीजिए सरकार ने एक क्विंटल चावल तैयार करने में लगभग 3900 से 4000 रुपये खर्च किए.

फिर वही चावल एथेनॉल नीति के तहत लगभग 2320 रुपये प्रति क्विंटल की रियायती दर पर प्लांट को दे दिया गया.

आरोप है कि कुछ मामलों में प्लांट संचालकों ने इस चावल से एथेनॉल बनाने के बजाय उसे लगभग 2800 रुपये प्रति क्विंटल में खुले बाजार में बेच दिया.

यानी बिना उत्पादन किए ही प्रति क्विंटल सैकड़ों रुपये का लाभ.

इसके बाद कथित तौर पर वही चावल राइस मिलों के जरिए फिर सरकारी गोदामों तक पहुंच गया.

यही वजह है कि इस पूरे मामले को कई विशेषज्ञ “परफेक्ट लूप” कह रहे हैं.

मामला सामने कैसे आया?

पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब सरकारी रिकॉर्ड और वास्तविक परिवहन में अंतर सामने आया.

आरोप है कि बालाघाट जिले के नवेगांव वेयरहाउस से एथेनॉल प्लांट के लिए भेजा गया एक ट्रक निर्धारित स्थान पर पहुंचने के बजाय एक निजी राइस मिल में मिला.

इसके बाद प्रशासन हरकत में आया और विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया.

जांच आगे बढ़ने पर कई जिलों में चावल आवंटन और परिवहन प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे.

किन जिलों में जांच पहुंची?

रिपोर्टों के अनुसार जांच के दायरे में कई जिले आए हैं, जिनमें—

  • बालाघाट
  • छिंदवाड़ा
  • सतना
  • धार
  • बैतूल
  • शहडोल
  • जबलपुर

सहित अन्य क्षेत्र शामिल हैं.

हालांकि, प्रत्येक जिले में अनियमितताओं की सीमा का अंतिम निर्धारण जांच पूरी होने के बाद ही होगा.

सिस्टम पर उठ रहे हैं बड़े सवाल

यह मामला केवल एक विभाग तक सीमित नहीं है.

इसने कई संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं.

क्या FIFO नियम का पालन हुआ?

पुराने स्टॉक की जगह बेहतर गुणवत्ता वाला चावल क्यों जारी हुआ?

क्या ट्रकों की निगरानी हुई?

क्या चावल निर्धारित स्थान तक पहुंचा?

क्या एथेनॉल वास्तव में बना?

क्या जारी किया गया पूरा चावल एथेनॉल उत्पादन में उपयोग हुआ?

क्या कस्टम मिलिंग की जांच हुई?

क्या वास्तव में धान की मिलिंग हुई या केवल कागजी प्रक्रिया पूरी की गई?

जिला प्रशासन की निगरानी कैसी रही?

क्या बिजली खपत, मशीनों के संचालन और उत्पादन की नियमित जांच की गई?

यही वे सवाल हैं जिनके जवाब जांच एजेंसियां तलाश रही हैं.

अब तक जांच में क्या सामने आया?

उपलब्ध जानकारी के अनुसार—

  • कई लोगों से पूछताछ की जा चुकी है.
  • कई ट्रकों को जब्त किया गया.
  • कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी हुई है.
  • दस्तावेजों और रिकॉर्ड की जांच जारी है.

हालांकि, जांच अभी पूरी नहीं हुई है और अंतिम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है.

एथेनॉल उद्योग का पक्ष

एथेनॉल प्लांट संचालकों के संगठन का कहना है कि यदि कहीं अनियमितता हुई है तो उसके लिए पूरे उद्योग को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए.

उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति या संस्था ने नियमों का उल्लंघन किया है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन पूरे सेक्टर की छवि खराब नहीं की जानी चाहिए.

सबसे बड़ा सवाल

यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं, तो सबसे बड़ा नुकसान केवल सरकारी खजाने का नहीं होगा.

इसका असर उन लाखों गरीब परिवारों पर भी पड़ेगा, जिनके लिए पोषण योजनाओं के तहत फोर्टिफाइड चावल तैयार किया जाता है.

यही कारण है कि यह मामला आर्थिक अनियमितता से कहीं आगे बढ़कर सामाजिक जिम्मेदारी और सरकारी जवाबदेही का विषय बन गया है.

निष्कर्ष

मध्य प्रदेश का कथित एथेनॉल चावल घोटाला कई गंभीर सवाल छोड़ता है.

क्या सरकारी योजनाओं की निगरानी पर्याप्त है?

क्या सार्वजनिक संसाधनों का सही उपयोग हो रहा है?

क्या दोषियों तक जांच पहुंचेगी?

इन सभी सवालों के जवाब जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होंगे.

फिलहाल इतना तय है कि यह मामला केवल करोड़ों रुपये के कथित आर्थिक नुकसान का नहीं, बल्कि उन लोगों के विश्वास का भी है जिनके लिए सरकार पोषण और खाद्य सुरक्षा की योजनाएं चलाती है.

यदि जांच में आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह केवल कानून के उल्लंघन का मामला नहीं होगा, बल्कि गरीबों के अधिकारों और सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग का भी गंभीर उदाहरण माना जाएगा.

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