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Toggleरीवा: मुफ्त शव वाहन योजना फेल! मौत के बाद भी घंटों इंतजार, अस्पतालों में भटकते परिजन
गरीब और जरूरतमंद परिवारों को राहत देने के उद्देश्य से शुरू की गई निशुल्क शव वाहन योजना अब कई सरकारी अस्पतालों में दम तोड़ती नजर आ रही है. योजना का मकसद था कि किसी भी परिवार को अपने प्रियजन के अंतिम सफर के लिए आर्थिक और मानसिक परेशानियों का सामना न करना पड़े, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है.
मध्यप्रदेश के कई सरकारी अस्पतालों में शव वाहन तो खड़े मिल जाते हैं, लेकिन जरूरत के समय चालक गायब रहते हैं. ऐसे में परिजन घंटों अस्पताल परिसर में शव के साथ इंतजार करने को मजबूर हो जाते हैं. कई मामलों में परिवारों को निजी एम्बुलेंस या अन्य साधनों का सहारा लेना पड़ता है, जिससे उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है.
यह स्थिति केवल एक अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेश के कई जिलों में यही तस्वीर देखने को मिल रही है. स्वास्थ्य विभाग की इस महत्वपूर्ण योजना की बदहाली अब प्रशासनिक लापरवाही और निगरानी व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर रही है.
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क्या है निशुल्क शव वाहन योजना?
सरकार द्वारा शुरू की गई निशुल्क शव वाहन योजना का उद्देश्य था कि अस्पताल में किसी मरीज की मृत्यु होने पर उसके शव को घर तक पहुंचाने के लिए परिवार को कोई शुल्क न देना पड़े. खासतौर पर गरीब, ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों से आने वाले परिवारों के लिए यह योजना बड़ी राहत मानी गई थी.
इस योजना के तहत सरकारी अस्पतालों में शव वाहन उपलब्ध कराए गए ताकि मृत्यु के बाद परिजनों को भागदौड़ और आर्थिक संकट से बचाया जा सके. लेकिन अब यही योजना कई जगहों पर सिर्फ कागजों तक सीमित होती दिख रही है.
अस्पतालों में खड़े वाहन, लेकिन चालक नहीं
ताजा मामला सरकारी अस्पताल परिसर से सामने आया, जहां एक साथ कई शव वाहन खड़े थे, लेकिन जरूरत पड़ने पर एक भी चालक उपलब्ध नहीं मिला. परिजनों को घंटों तक इंतजार करना पड़ा.
जानकारी के अनुसार, शव वाहन उपलब्ध होने के बावजूद ड्राइवरों की अनुपस्थिति के कारण मृतक के परिजन अस्पताल परिसर में परेशान होते रहे. कुछ परिवारों ने आरोप लगाया कि बार-बार अस्पताल प्रशासन से गुहार लगाने के बाद भी कोई समाधान नहीं निकला.
सबसे चिंताजनक बात यह रही कि कई घंटे बीतने के बाद भी शव वाहन सेवा शुरू नहीं हो सकी. इस दौरान परिजन मानसिक तनाव और दुख के बीच लगातार मदद की गुहार लगाते रहे.
गरीब परिवारों पर बढ़ रहा आर्थिक बोझ
निशुल्क सेवा का उद्देश्य आर्थिक राहत देना था, लेकिन व्यवस्था फेल होने के कारण गरीब परिवारों को मजबूरी में निजी वाहनों का सहारा लेना पड़ रहा है. निजी एम्बुलेंस संचालक अक्सर लंबी दूरी के नाम पर हजारों रुपये तक वसूल लेते हैं.
ग्रामीण इलाकों से आने वाले परिवारों के लिए यह खर्च और भी भारी पड़ता है. कई बार परिवार कर्ज लेकर शव को गांव तक पहुंचाने के लिए मजबूर हो जाते हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति किसी भी कल्याणकारी योजना की असफलता को दर्शाती है. अगर सरकारी अस्पतालों में मूलभूत सेवाएं ही समय पर नहीं मिलेंगी, तो गरीबों का भरोसा व्यवस्था से उठना तय है.
प्रशासनिक निगरानी पर उठ रहे सवाल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल निगरानी व्यवस्था को लेकर खड़ा हो रहा है. आखिर अस्पताल परिसर में वाहन मौजूद होने के बावजूद चालक क्यों नहीं थे? क्या ड्राइवरों की ड्यूटी तय नहीं थी? क्या अधिकारियों द्वारा नियमित मॉनिटरिंग नहीं की जा रही थी?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई जगहों पर शव वाहन योजना सिर्फ दिखावे तक सीमित रह गई है. वाहन खड़े रहते हैं लेकिन उनका संचालन समय पर नहीं हो पाता। इससे स्पष्ट होता है कि योजना के संचालन में गंभीर लापरवाही बरती जा रही है.
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों पर भी सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इतनी महत्वपूर्ण सेवा की निगरानी किसके जिम्मे है और कार्रवाई क्यों नहीं हो रही.
परिजनों की पीड़ा: मौत के बाद भी संघर्ष
किसी भी परिवार के लिए अपनों को खोने का दर्द बेहद बड़ा होता है. ऐसे समय में यदि अस्पताल प्रशासन की लापरवाही के कारण उन्हें घंटों शव के साथ इंतजार करना पड़े, तो यह पीड़ा और बढ़ जाती है.
परिजनों का कहना है कि अस्पतालों में उन्हें केवल आश्वासन मिलता रहा, लेकिन समय पर वाहन उपलब्ध नहीं कराया गया. कई लोगों ने इसे अमानवीय व्यवस्था करार दिया.
एक परिजन ने बताया कि अस्पताल में चार शव वाहन खड़े थे, लेकिन चालक का कोई पता नहीं था. बार-बार अधिकारियों से संपर्क करने के बाद भी कोई समाधान नहीं निकला.
स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई उजागर
यह मामला केवल शव वाहन सेवा की बदहाली नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरियों को भी उजागर करता है. करोड़ों रुपये खर्च कर योजनाएं शुरू तो कर दी जाती हैं, लेकिन उनकी मॉनिटरिंग और संचालन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी सेवाओं के लिए जवाबदेही तय होना बेहद जरूरी है. यदि समय पर कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में ऐसी घटनाएं और बढ़ सकती हैं.
क्या होना चाहिए समाधान?
स्थिति को सुधारने के लिए स्वास्थ्य विभाग को तत्काल ठोस कदम उठाने की जरूरत है. इसके लिए:
- सभी शव वाहनों की नियमित मॉनिटरिंग हो.
- ड्राइवरों की ड्यूटी और उपस्थिति सुनिश्चित की जाए.
- शिकायत मिलने पर त्वरित कार्रवाई हो.
- अस्पतालों में कंट्रोल रूम या हेल्प डेस्क बनाई जाए.
- जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त वाहन और चालक नियुक्त किए जाएं.
यदि समय रहते व्यवस्था नहीं सुधारी गई, तो यह योजना पूरी तरह से भरोसा खो देगी.
सरकार और प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती
मध्यप्रदेश सरकार लगातार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के दावे करती रही है. लेकिन शव वाहन जैसी बुनियादी सेवा में लापरवाही इन दावों पर सवाल खड़े करती है.
मौत के बाद भी यदि परिवारों को अपनों के शव के लिए संघर्ष करना पड़े, तो यह किसी भी संवेदनशील समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है. अब देखने वाली बात होगी कि स्वास्थ्य विभाग इस मामले में क्या कार्रवाई करता है और क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर जवाबदेही तय होती है.
निष्कर्ष
निशुल्क शव वाहन योजना गरीब परिवारों के लिए राहत बन सकती थी, लेकिन कई अस्पतालों में यह व्यवस्था अब खुद सवालों के घेरे में है. वाहन होने के बावजूद चालक का गायब रहना, घंटों इंतजार और परेशान परिजन यह बताने के लिए काफी है कि सिस्टम में कहीं न कहीं गंभीर खामी है.
जरूरत इस बात की है कि सरकार केवल योजनाओं की घोषणा तक सीमित न रहे, बल्कि उनके सही संचालन और निगरानी को भी प्राथमिकता दे. क्योंकि किसी परिवार के लिए अपने प्रियजन को सम्मानजनक अंतिम विदाई देना केवल सुविधा नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और मानवीय अधिकार का सवाल है.
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